Wednesday, December 28, 2011

Dil hain kadamon pe kisi ke

दिल हैं कदमो पे किसी के
सर झुका हो या न हो ,
बंदगी तोः अपनी फितरत हैं 
खुदा हो या न हो |
 

Tuesday, November 29, 2011

hasti ka shor to hai magar ...

हस्ती का शोर तोः हैं मगर ऐतबार क्या ,
झुटी खबर किसी कि उडाई हुई सी हैं ... |

Thursday, November 10, 2011

lo hum bataye ..

लो हम बताये गुंचा और गुल में हैं फर्क क्या ;
एक बात हैं कही हुई, एक बे-कही हुई |


[ गुंचा = कली ]
[ गुल = फुल ]

Thursday, September 8, 2011

kar raha tha ghum-e-jahan ka ...

कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए | 
  -- फैझ अहेमद फैझ

Sunday, November 14, 2010

samay ne jab bhi andheron ...

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती कि हैं 
जला के अपना ही घर; हमने रोशनी कि हैं

है मेरे घर में आज भी वो धुएं के धब्बे 
हाँ यहीं पर कभी उजालो ने खुदखुशी कि हैं

ना लड़खडायाँ हूँ कभी और ना लड़खडाऊँगा 
फिर तुमने मुझे पिलाने में क्यूँ कमी कि हैं  ?

Sunday, July 11, 2010

Lagata nahi dil mera ..


लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलम-ए-ना-पायदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए, दो इंतज़ार में

कितना है बदनसीब ज़फर दफ़न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

-- बहादुर शाह ज़फर

Monday, July 5, 2010

Yeh sannata bahut mahenga padega ..

ये सन्नाटा बहुत महँगा पडेगा
उसे भी फूट कर रोना पडेगा

वही दो चार चेहरे अजनबी से
उन्हीं को फिर से दोहराना पडेगा

कोई घर से निकलता ही नहीं है
हवा को थक के सो जाना पडेगा

यहाँ सूरज भी काला पड़ गया है
कहीं से दिन भी मंगवाना पडेगा

वोः अच्छे थे जो पहले मर गए हैं
हमें कुछ और पछताना पडेगा

-- फज़ल ताबिश

Nahin chuni maine yeh jameen ..

नहीं चुनी मैंने ये ज़मीन जो वतन ठहरी
नहीं चुना मैंने वो घर जो खानदान बना
नहीं चुना मैंने वो मज़हब जो मुझे बख्शा गया
नहीं चुनी मैंने वो जुबां जिसमें माँ ने बोलना सिखाया
और अब मैं इन सब के लिए तैयार हूँ
मरने
मारने पर ....

-- फज़ल ताबिश

Jaanewalon se rabta rakhana ..

जानेवालो से राब्ता रखना
दोस्तो रस्म-ए-फातिहा रखना

घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना

मस्जिदें हैं नमाजियो के लिए
अपने घर में कहीं खुदा रखना

जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना

उमर करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना


--निदा फाज़ली

Bandagi humne ...

बंदगी हमने छोड़ दी हैं फ़राज़ 
क्या करे लोग जब खुदा हो जाये |
-- फ़राज़  

Akl pe hum ko naaz ..

अक्ल पे हम को नाज़ तो बहुत था लेकिन, 
इश्क के हाथो ये भी होगा कि लोग हमें समझायेंगे .. |

-- अहमद हमदानी

Koi yaad aaya savere savere ..

कहेता था कल शब् संभालना-संभालना 
वही लडखडाया सवेरे-सवेरे  

कटी रात सारी मेरी मैकदे में 
खुदा याद आया सवेरे-सवेरे


-- सैयद राही

Na pucch dil ki haqiqat magar ..

न पूछ दिल कि हकीक़त मगर ये कह दे 
वोह बेकरार रहे ; जिसने बेकरार किया .. |

-- दाग दहेलवी

Sunday, July 4, 2010

Har ek saans na jaane thi justju kiski ..

हर एक साँस न जाने थी जुस्तजू किसकी 
हर एक दयार मुसाफिर को बेदयार मिला ,

यह शहर हैं कि नुमाइश लगी हुयी हैं कोई 
जो आदमी भी मिला बनके इश्तिहार मिला |

-- निदा फ़ाज़ली

Kyun na firdous ko dojak main ..

क्यूँ ना फिरदौस को दोज़क में मिलाले या रब 
सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही .. |

-- ग़ालिब

Jab tak mile na the ..

जब तक मिले ना थे जुदाई क़ा था मलाल 
अब यह मलाल हैं कि तमन्ना निकल गई |

Mamur-e-fanaa ki kotieyan ..

मामूर-ए-फ़ना कि कोताईयाँ तो देखो 
एक मौत क़ा भी दिन हैं; दो दिन कि ज़िन्दगी में |

Tar ke taluqat pe roya na tu na main ..

तर के तालूकात पे रोया ना तू ना मैं 
लेकिन ये क्या कि चैन से सोया ना तू ना मैं  |

Jab tak bika na tha ..

जब तक बिका ना था, कोई पूछता ना था 
तुने मुझे खरीद के अनमोल कर दिया |

Jannat ki haqiqat ..

जन्नत कि हकीक़त हम भी जानते हैं लेकिन,
दिल बहेलाने के लिए ग़ालिब ये ख़याल अच्छा हैं |