Sunday, November 14, 2010

samay ne jab bhi andheron ...

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती कि हैं 
जला के अपना ही घर; हमने रोशनी कि हैं

है मेरे घर में आज भी वो धुएं के धब्बे 
हाँ यहीं पर कभी उजालो ने खुदखुशी कि हैं

ना लड़खडायाँ हूँ कभी और ना लड़खडाऊँगा 
फिर तुमने मुझे पिलाने में क्यूँ कमी कि हैं  ?

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