Sunday, July 4, 2010

Har ek saans na jaane thi justju kiski ..

हर एक साँस न जाने थी जुस्तजू किसकी 
हर एक दयार मुसाफिर को बेदयार मिला ,

यह शहर हैं कि नुमाइश लगी हुयी हैं कोई 
जो आदमी भी मिला बनके इश्तिहार मिला |

-- निदा फ़ाज़ली

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